Wednesday, February 5, 2020

... एक इनसां तुम हो ....

...  कि इनसां तुम हो ....


रंज़िशों के दौर में बन बैठे है मुर्दा दिल सभी ,
   रोशनी ए ज़िंदगी दिखाओ तो समझो  कि इंसान तुम हो ||


नफ़रातों की लानतें है मारता हर कोई ,
पैगाम ए मोहब्बत फैलाओ तो समझो  कि इंसान तुम हो ||

खुदगर्ज़ी में मशगूल रहता है हर कोई ,
कभी दूसरो के काम आओ तो समझो  कि इंसान तुम हो ||


इबादतों में ढूंढता है अपना खुदा हर कोई,
कभी इंसानो में उसे पाओ तो समझो  कि इंसान तुम हो ||

अपनो के लिए तो जीता है हर कोई
कभी दूसरी के आँसू मिटाओ तो समझो  कि इंसान तुम हो ||

मेरा  खुदा मुझमें  है, और है वो तुममें भी ,
बस अपनी खुदाई को जगाओ , तो समझो  कि इंसान तुम हो ||












Monday, October 21, 2019



"बस  एक सोच "

एक सोच  ही तो है
बस एक सोच ही तो है |

गिरते को उठा दे या उठते को गिरा दे ,
बस एक सोच ही तो है |

रंक को राजा या राजा को रंक बना दे ,
बस एक सोच ही तो है |

सत्यभी एक सोच ही है , असत्य भी एक सोच ही ,
कर्मण्यता भी एक सोच ही है , और शिथिलता भी एक सोच ही |

प्रेम भी एक सोच है और करुणा भी एक सोच ही ,
मानवता भी सोच ही है और पाशविकता भी सोच ही |

चेतनता भी सोच ही है और जड़ता भी एक सोच ही
ज्ञान भी सोच ही है और मूढ़ता भी एक सोच ही |

जीवन भी तो सोच ही है और मृत्यु भी एक सोच ही 
सृजन भी हाँ सोच ही है और विनाश भी एक सोच ही |

गीता और क़ुरान यही है और ईसा का बलिदान यही ,
बुद्ध का निर्वाण यही है और नानकजी  का पाठ यही |

सोच से ही मैं बना हूँ और सोच से भी  तुम ही ,
सोच ही शुरुआत भी है  और सोच ही है अंत भी | 

कितनी बलशाली है यह सोच , और कितनी मतवाली भी ,
सदियों से है इसका परचम , और रहेगा विद्यमान भी |

आओ अपनी सोच को बढ़ाएँ और आगे बढ़ें , और आगे बढ़ते ही रहे ...

लेकिन फिर मैं सोचता हूँ , कि...
अपनी सोच को आगे बढ़ाना भी तो एक सोच ही तो है ,
एक सोच ही तो है 
बस एक सोच ही तो है ||

Monday, May 21, 2018

                                                       "विजय पताका"




कठिनाइयों में भी जो पथ से नही डगमगाते है ,
बस वही मतवाले विजय पताका फहराते हैं   ||


    द्रढ़निश्चयता लेकर मन में ,जो नित्यता अपनाते हैं,
बस वही मतवाले विजय पताका फहराते हैं   ||


    खुद में ही है खुदा , जो इस राज़ को पहचानते हैं,
बस वही मतवाले विजय पताका फहराते हैं   ||


पुरुषार्थ के लौह को ज्यूँही कुंदन बनाते हैं ,
बस वही मतवाले विजय पताका फहराते हैं   ||


 परिश्रम की पूंजी को ,जीवन कुंजी जो बनाते हैं,
बस वही मतवाले विजय पताका फहराते हैं   ||

                                                              अंततः 

         जीवन के इस कुरुक्षेत्र में जो रणकौशल दिखलाते हैं,
बस वही मतवाले विजय पताका फहराते हैं   ||


बस वही मतवाले विजय पताका फहराते हैं   ||

Sunday, December 4, 2016

           
    आज  का हिन्दुस्तान

मैं आज का हिन्दुस्तान हूँ,
मैं आज का हिन्दुस्तान हूँ ||

जो गोरे थे वो चले गये,
अब काले अँग्रेज़ों से लुट रहा हूँ,
मैं आज का हिन्दुस्तान हूँ ||

रहा है जिस  सभ्यता का अभिमान मुझे,
उस गंगा जमुनि तहज़ीब को ढूँढ रहा हूँ,
मैं आज का हिन्दुस्तान हूँ ||

है कुछ हिंन्दु और कुछ मुसलमान भी,
सिर्फ़  सच्चे इंसानो को ढूँढ रहा हूँ,
मैं आज का हिन्दुस्तान हूँ ||

देखे बहुत सिकंदर ,और हिट्लर भी,
बस एक और गाँधी को ढूँढ रहा हूँ,
मैं आज का हिन्दुस्तान हूँ ||

पाई है औद्योगिक क्रांति , और हरित क्रांति भी
पर ये आज़ादी है विचार क्रांति के बिना अधूरी सी ,
एक नयी वैचारिक क्रांति को ढूँढ रहा हूँ,
मैं आज का हिन्दुस्तान हूँ ||
मैं आज का हिन्दुस्तान हूँ ||





Saturday, September 10, 2016

                  "पार्थ और अभिलाषा"


पार्थ :     हे अभिलाषा ,क्यूँ आ जाती हो तुम बार बार
            जानती हो की मान चुका हूँ मैं हार
             फिर भी आ जाती हो बार बार ||
          
              समय के थपेड़ों से हो चुका हूँ मैं त्रस्त
              क्यूँ करती हो मुझको आश्वस्त |
              है और नही शक्ति शेष मुझमें,
              और प्रारब्ध से कर ली है संधि मैने ||


अभिलाषा :    हे पार्थ, समय ने  निभाया अपना धर्म ,पर तुमने नही
                     है कौन वो विरला ,समय ने जिसको परखा नही ||

                     निरंतर प्रयास ही सफलता की कुंजी है
                     और  परिश्रम ही तो कर्मनायकों की पूंजी है ||
                     पत्थर भी चोट खाकर ही कलाकृति बनता है
                     और सोना भी आग में तापकर कुंदन बनता है ||

                     अतः हे पार्थ , यह एक शाश्वत सत्य है
                      तुम्हारा कर्मपथ ही तुम्हारा धर्मपथ है ||

                      बस इसी बात का आभास कराने  आती हूँ,
                      तुम हो एक पार्थ , तुम्हें पार्थ बनाने आती हूँ
                                                      तुम्हें पार्थ बनाने आती हूँ ||
          

Monday, August 29, 2016

Meditation=Living in the moment

Meditation is an art which promises inner peace of mind and tranquility to the soul.
While all of us know that meditation probably has may solutions to our problems, we often don't try to meditate as it is considered as difficult for normal human beings ,and due to ignorance about it, we think meditation as the domain of the mendicants,sanyasis,rishis or godmen.

I had also never thought about meditation as an easy practice ,but a short video on my friend's  facebook page about meditation changed my notions about  meditation  and forced me to think of  it as very much achievable, meaningful and easy to understand.

Well, the monk in the video said that simplest of meditation techniques is 'Breathing in , then breathing out and just remaining conscious of your breaths while doing so'.

His sentence about remaining conscious and taking note of your deep breaths was the turning point of my thoughts and then I began to add my own annotations to it .

Perhaps, the monk wanted to emphasize on the  importance of living in the present moments,enjoying the power of your existence and soothe your mind by meditating on the power of breathing.
Now, we all know that breathing is essential for life ,but how many of us are enjoying it fully ?

By giving importance to your breathing techniques ,by feeling  your breath, you come close to the creator of the world and in a way ,you talk to him directly.It is also said that God resides within your own self (अहं ब्रहमस्मि),so you communicate to your own inner/outer world, creator of the universe by trying to reach out to him through your deep breaths and feeling his existence within.

Also, your entire world is in the present only.Your action,thoughts in the present is going to determine your future, so giving importance to your present is of paramount importance. So, indirectly this meditation technique tells you to dwell on the present and enjoy the power within yourself.

As you are an intrinsic part of this universe, your actions and your thoughts also contribute to this immense formation called universe .So, by imparting purity and deep thought to your present actions will go a long way in deciding your future and future of the world also.

So, meditation in very simple terms is giving importance to your present actions and thoughts  as they are going to determine your future.







Sunday, July 17, 2016

" क्षितिज मुट्ठी में "

मेरे द्वारा एक रचित कविता :

        " क्षितिज मुट्ठी में "

बस पूछ बैठा यूहि मैं अपने मन से
क्या क्षितिज होते है आगे आसमाँ से,
मन सकपकाया ,फिर बोला
आसमाँ से आगे शून्यता है,क्षितिज नही ||


लेकिन ए मन, है तो ये सुनी सुनाई बात,
चल चलते है और करते है प्रकृति से साक्षात्कार |

हिम्मत,मेहनत और अब था मन का साथ,
चलते चलते पहुँच ही गये आसमाँ से पार |
पाए वहाँ नये क्षितिज और नये जहाँ,
फिर किया मैने अपने मन से सामना |

ए मन कहता था तू ,होगा शून्य यहाँ,
देख यह शून्‍य है कितनी असीमितताओं से भरा हुआ|

तब मन मुस्कुराया ,और बोला
 रे पगले,तू और मैं अलग थोड़े ही हैं |
कभी मैं तुझे समझाता हूँ ,कभी तू मुझे,
तू मेरा संबल है और मैं तेरा

बस एक साम्जन्स्य चाहिए तुझमें और मुझमें
फिर हर क्षितिज है हमारी मुट्ठी में ,
हर क्षितिज है हमारी मुट्ठी में ||